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फ़िल्म समीक्षा: नया दौर

अभी मैंने 1957 में रिलीज 'नया दौर' फ़िल्म देखा. इसे देखने के बाद जो कुछ भी मेरे जेहन में उपजा उसे शब्द देने की कोशिश कर रहा हूँ. मैं दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला या अजित के अदाकारी की बात नहीं करना चाहूंगा.... उनकी विश्लेषण मेरे बस की बात नहीं, बस इतना कहना चाहूंगा कि 60 के दशक में बनी इस फ़िल्म में की गई अदाकारी अपने समय से बहुत आगे थी, शायद अभी के समय से भी मेल नहीं खाती. मेरा उद्देश्य उस फ़िल्म के महीन धागों के बारे में बात करना हैं.
            मुझे इस फ़िल्म में निम्न बिंदुओं के संदर्भ में सोचने का मौका मिला
1. सामाजिक सौहार्द
2. मानवीय मूल्य
3. मशीनों, आधुनिक तकनीक, मानव और रोजगार
4. अकेला चला और कारवाँ बनता गया
5. जनभागीदारी की शक्ति
6. आत्मविश्वास की शक्ति और परस्पर विश्वास
7. समाज से ना जुड़ के रहने के नकारात्मक पक्ष ( कारखाने का युवा मालिक के रूप में)
8. प्यार और दोस्ती के महीन धागे

                 इस फ़िल्म की शुरुआत ही एक आपसी भाई-बहन और माँ के अपनापन से भरे संबंध के साथ होता हैं. लोगों के अंदर जैसे भाईचारा और आपसी सौहार्द को दिखाया गया है, वो आज के समाज या किरदारों में दिखा पाना असंभव होता दिख रहा हैं.

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