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दिसम्बर का यूँ गुजर जाना.................. !

                                                                     वैसे तो बारह महीने के एक वर्ष होते हैं, पर वास्तविक व्यवहार में मैं दस महीने ही मानता हूँ. दिसम्बर तो ऐसे ही रोते-गाते, ऐसा लगता हैं कोई महबूब की विदाई हैं उस गम में कब गुजर जाता हैं पता ही नहीं चलता. बचपन में यही दिसम्बर कितना खुश कर जाता था, की नया वर्ष आ रहा हैं.....पर अब तो बेवजह उदासी आ जाती हैं दिसम्बर महीने में. यही वो वर्ष का महीना होता हैं जब हम जनवरी में लिए गए वादों का विश्लेषण करते रहते हैं और ऐसा होना शत-प्रतिशत संभावित हैं की जो आप चाहेंगे वो पुर्णतः पूरा होगा नहीं. लेकिन हमारा दिल इस तर्क के तरफ ध्यान ही नहीं देता. अहा ! जनवरी मेरी जान......ठीक कॉलेज के उस क्रश जैसे हैं जिसके चले जाने का दुःख तब होता हैं जब वो किसी और के बाहों में हो, यानी जब ये जनवरी का महिना समाप्त हो जाता हैं तब हम भ्रम से बाहर आते है की अरे ये नया साल तो शुरू हो गया.  हे ! समय-निर्माता आपको वर्ष के पहले और अंतिम महीने को बोनस में दे देना चाहिए था. दिसम्बर को पहली बार मैंने लखनऊ में अपने हॉस्टल के दोस्तों के साथ 2009 में सेलिब्रेट किया था , उस समय ऐसा साथ था दोस्तों का की कुछ भी उनके साथ सेलिब्रेट किया जा सकता था. धीरे धीरे समय गुजरा सब जीवन में अपने प्राथमिकता के अनुसार अस्त-व्यस्त हो गये. उनके साथ बार-बार जीने का मन करता हैं, लेकिन कुछ चीजें वापस नहीं आती उसमें से वो पल भी था. फिर मै शायद ही कभी दिसम्बर में खुश रहा हूँ, ये अजीब महिना होता हैं 

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