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जाने चले जाते है कहाँ......!

                     
अशोक वृक्ष के नीचे दो महीने पहले हल्की मुस्कान 



   मेरे दोस्त जैसे मेरे खुशमुख बाबा नहीं रहे, कुछ समझ में नहीं आ रहा हैं ....क्या करूं ? जिन्दगी कितनी निर्दयी हैं, बाबा के जाने से बहुत डर सा गया हूँ सांसारिक रिश्तों से ! बाबा की मृत्यु से परिवार के हर व्यक्ति की संभावित मृत्यु को सोच सोच कर दिल और बैठ रहा हैं. गाँव -घर रोज हल्का होता जा रहा हैं. अनुभव का साथ छूटता चला जा रहा हैं .बड़े बूढ़े हमें इस वीरान धरा पर छोड़कर जा रहे हैं. एक एक करके सब चलते जायेंगे और दुःख का घड़ा फूटता चला जाएगा. थोड़ा भावुक और दुखी हूँ अभी, घर से 150 किलोमीटर की दुरी पर हूँ घरवालों ने जानबूझ कर मुझसे देर रात में बताया ताकि भूखे पेट न सो जाऊं.........बहुत दुखी हूँ, खूब चिल्लाने का मन कर रहा हैं, अपने सिर के बाल नोचने से भी राहत नही मिल रही हैं...बाबा कितना प्यार करते होंगे ये नही मैं जान सका पर उनके वाणी में मेरे लिए सदैव इतना प्यार झलकता रहा जिसे मै कभी चुका नहीं पाया इसका अफ़सोस शायद मुझे मरते वक़्त तक होगा. मुझे "डिपू सिंह" कहा करते थे और मैं उन्हें प्यार से "बुढवा बाबा" कहता था.  उनको मैंने जो सपने दिखाए वो उनके रहते पूरा ना कर सका. बाबा मेरे पहले व्यक्ति थे जिनके मौत को दिन प्रतिदिन नजदीक आते देखा मैंने. नवरात्रि के शुरू के दिन में बारिश के कारण घर के सामने गिर पड़े और फिर ना उठने का कसम खा लिए और आज इस विशाल निर्वात में विलीन हो गए . दीदी बाबा से मिलने नहीं आ पा रही थी, इसका मुझे बहुत रंज हो रहा था की दीदी कहीं बाद में पश्चाताप न करें लेकिन दीदी ने भी अपनी पूरी कोशिश करी और बाबा से मिल पाई और आज ही वापस अपने घर भी निकल गयीं, ज्यों ही वो अपने घर पहुची हैं बाबा कहीं और के अनंत सफ़र पर निकल पड़े हैं ........मुझसे अब घर से बाहर नहीं रहा जाएगा, सब मिथ्या लग रहा हैं, अपने छुटते जा रहे है और मैं केवल उस वक़्त पहुच पाता हूँ जब शरीर निर्जीव हो चूका होता हैं. अभी 7-8 दिन पहले घर गया था तो पहले से बाबा गिरे थे तो चोट लगा था मैंने पूछा "दर्द हो रहा है बाबा" ....तो उन्होंने अपने जांघ को छु कर सहमती में सिर मात्र हिलाया, जब मैंने उनका पैर अपने हाथ में लेकर हल्का हल्का स्पर्श करना शुरू किया तो उन्होंने अपने आप को ढील दे दी थी यानी उन्हें आराम पहुँच रहा था. बोलने तक की शक्ति नहीं बची थी..... कोई जाता तो अपने बारे में पूछता तो संकेत में पहचानते थे. एक स्वस्थ्य वृध व्यक्ति बिछलन के वजह से गिरते हैं और 16 दिन बाद काल के गाल में समा गए. उनके मृत्यु को घर से दूर रहकर भी मैंने हर पल महसूस किया हैं, नसें बैठ गयीं थी जिससे कुछ बाह्य इलाज भी असंभव हो गया था.गले की नीचे कुछ उतरना मुश्किल हो गया हैं, पिछले 7-8 दिनों से प्रतिदिन मात्र 1-2 चम्मच पानी पी पा रहे थे, कुछ खाना तो 10 दिन से छोड़ चुके थे.....मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की शायद अपने आपको बलपूर्वक मारने की चेष्टा में भी लगे हैं, क्योंकि मृत्यु से 1-2 घंटे पूर्व तक उनकी चेतना स्थिर थी. उनका हाल देखकर इतना अहसास तो हो गया था की अब ये विशाल अनुभव का दामन बहुत जल्द ही छुटने वाला हैं. जब मेरी ईया(दादी) का निधन हुआ था तब बाबा खूब दुखी हुए थे. मुझपर बहुत आस लगाए थे की ये कुछ करेगा, लेकिन मैं भी उन्हें जाते समय अपने तरफ से निश्चिंत नहीं कर सका, कोशिस करूँगा की बाबा के सपने को जी सकूँ. वृक्ष सामान घर के सबसे पुराने और बड़े जड़ थे, अब टहनियां मुरझा सकती है यदि उन्हें अतिरिक्त उर्जा नहीं मिला तो. बचपन की सभी यादें फिल्म की भातीं गुजरती चली जा रही हैं, सबको शब्द दे पाना तो असंभव हैं क्योंकि तीव्र गति से आ जा रही हैं. लेकिन उन्ही में से जिन्हें मैं संभाल पा रहा हूँ. उनमें से सबसे बड़ी और मीठी याद हैं साइकिल सीखने वक़्त का ...कैसे बाबा खाट पर सोये रहते और मैं चुपके से साइकिल निकालता तो अचानक से उनकी नींद खुल जाती और मैं साइकिल लेकर भागता और बाबा पीछे से झुके हुए लम्बे शरीर को लाठी से सहारा देते हुए मेरे पीछे दौड़ पड़ते ताकि कोई अनहोनी न घटित हो , उस समय इतनी सामर्थ्य नहीं थी की उनकी भावनावों को समझ पाऊं, उस समय तो मेरे दुश्मन लगते थे. अब मैं जब भी बाहर से जाता तो बुलाते और पूछते की देश- दुनिया में क्या चल रहा हैं और बहुत ही एकाग्र होकर मेरी बातों को सुनते थे और मैं अगर उनसे कुछ पूछता तो उनकी यादें तो थोड़ी धूमिल हो चुकी थी पर अनुभव इतना की सामने वाला का पात्र छोटा पड़ जाए, खूब ढेर सारा सुझाव और सीख देने की कोशिश किया करते थे. मैं अपने आप को घर में बड़े शालीन तरीके से रखने की कोशिश करता हूँ पर उनके साथ अगर थोडा भी कोई दुर्व्यवहार करता तो मेरा खून खुल जात था. मुझे हैंडपंप पर नहाते देख, खुद भी चले आते और जब मैं नहा लेता तो मुझसे बोलते की," अब हमरो के नहवा द डिपू". कितनी यादें है उनके साथ की जो शायद वक़्त के साथ साथ कमजोर हो जाए पर जो कुछ भी मैंने उनसे सिखा है वो चीजें तो रच बस गयीं हैं मेरे अन्दर.
अशोक वृक्ष के नीचे दो महीने पहले नींद के आगोश में 

अंतिम दो दिनों से गले में भारी मात्रा में कफ हो गया था जिससे श्वशन प्रक्रिया भी सामान्य नहीं थी और साथ ही चोट....बहुत दुःख में थे उनको देखकर ऐसा लगता था की जितना जल्दी जाएँ उतनी जल्दी उन्हें शान्ति मिले. पर आज मैं उस चीज को ही स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ. अभी भी तनिक विश्वाश नही हो रहा हैं की वो अब इस धरती पर नहीं रहें. इधर पिछले दो दिनों से मै फोन पर बाबा का हालचाल पूछने का भी हिम्मत नहीं जूटा पा रहा था. मुझे डर लगता था की कहीं कोई बुरा खबर न सुनना पड़ें, लेकिन जो होना होगा वो तो होगा ही . पिछले 15-16 दिनों से जैसे बात हो रहा घर पर पता नहीं क्यूँ मुझे आज वैसी उम्मीद नहीं थी इसलिए मै डर के कारण बाबा के बारे में कुछ नही पूछ रहा मम्मी भी जानबुझ कर दीदी के बारे में बता रही हैं, मुझे मम्मी का गला रुंधा हुआ सा लगा तो मेरा अंतःकरण तो समझ गया पर दिमाग नहीं मान रहा था फिर मैंने मम्मी से कहा की ," मम्मी लागत बा तहरा सर्दी हो गईल बा". उन्होंने उस वक़्त कहा," हाँ ", तब मैंने राहत की सांस ली पर उनका   अगला वाक्य था की," खाना खा ले ले बाड़ा ". मैंने भी इसे नियमित प्रश्न के रूप में लिया और  ," हाँ " बोला. तभी माँ ने कहा की,"ये बाबू, बाबा त नइखन". मुझे एकवक़्त के लिए पूरी दुनिया रुकी हुई प्रतीत हुई .सिर फट रहा था , सिर के बाल नोचे जा रहा था, सुबह घर निकलना हैं इसलिए सोचा बाबा को एकबार सोच कर यहीं अकेले में रो लूँ. घर पर ऐसी निजता नहीं मिलेगी.
तीन वर्ष पहले जब मैंने एक बार बाबा को सेल्फी क्लिक करने के लिए राजी किया था 


अब जब बाबा नहीं है तब जब घर जाने की स्थिति को सोचकर बहुत दुःख होगा..... कुर्सियां खाली होंगी, छोटे से खाट पर बाबा नहीं मिलेंगे, मै घर जाऊँगा तो देश दुनिया की ख़बरें कोई नहीं पूछेगा, फसल कटाई के वक़्त घर पर सबको डांट कोई नहीं लगाएगा, अखबार के उड़ते पन्नो को समेटने वाला कोई न होगा, बच्चों के बदमाशी पर थोड़ा लाड़ के साथ डांटने वाला कोई नहीं होगा, मुझे बड़े बड़े नाख़ून काटने को नहीं नसीब होगा, एक मासूम सी मुस्कराहट नही दिखेगी...जिसे मै हमेशा चुपके से क्लिक करने के कोशिश में लगा रहूँ, अब जब भी घर जाऊँगा उदास दूआर मिलेगी, फसलों और खेतों की चिंता अब कौन करेगा. जीवन के झंझावातों से बाबा ने कभी तमाम प्रश्न पूछ कर डराया नहीं बल्कि उन्होंने सदैव मुझपर विश्वाश किया, मेरी असफलताओं को दरकिनार कर बड़ा सोचने की हिम्मत दी और खूब हौसला दिये , मेरे नन्हे से मष्तिष्क में बड़े सपने का बीजरोपण किया. यही हासिल है उस पीढ़ी का जो अब नसीब नहीं होगा इस क्षति की पूर्ति कोई नहीं कर पायेगा. बुजुर्गों के जाने से एक दुनिया ही खोते जा रहे हैं हम, एक ऐसी दुनिया जिसकी मजबूत बुनियाद पर हम अपने जीवन को नईं ऊँचाइयों पर ले जाने की हिम्मत करते हैं. सफलता की उंचाई अक्सर नींव की गहराई नहीं देख पाती. नींव के हिलने के बाद हम उंचाई कब तक बरकरार रख पायेंगे .अगर वो घर पर डट कर बैठे तो हम यायावर जैसे जीने की तमन्ना रख पाते हैं, ऊँची उड़ान भरने का सपना देख पाते हैं. ज्यादा अनुभव तो नहीं है पर हम युवा जिस तरह से इस गाढ़ी अनुभव वाली पीढ़ी से बिना कुछ सीखे खोते जा रहे है, उसकी कमी मुझे बहुत बैचैन करती है. बाबा के चले जाने से मस्तिष्क व्याकुल हैं मानों कुछ उजड़ने वाला हो, कुछ ढहने वाला हों. पता नहीं क्या होगा.
अशोक वृक्ष के नीचे दो महीने पहले गपशप में बाबा  

इस बार होली के वक़्त गाँव में फगुवा गीत गाने के लिए उठ खड़े हुए थे (सिर पर गमछा बांधे हुए )

                                                         ज्यादातर चिंतन मनन में रहते थे 
                                               बाबा कभी-कभार ही निराश दीखते थे 


मेरे प्यारे बूढ़े बाबा आप बहुत याद आयेंगे.....आपका मेरे प्रति आस अब शायद मुझे चैन से रहने न दे. आपको जो सपने मैंने दिखाए उन्हें पूरा करूँगा. आपका आशीर्वाद अपेक्षित होगा, भगवान से अपने अंतर्मन से प्रार्थना करता हूँ की आपके आत्मा को शान्ति मिले और आप जहाँ भी रहे वही प्यार, स्नेह और करुणा बरसाते रहें. 

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